पलटू कुमार के नाम से जाने ,जाने वाले कथित सुशासन बाबू नीतीश का यूं दिल्ली राज्यसभा में अचानक जाना नहीं है बल्कि यह बहुत पहले सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा को बिहार चाहिए था, उसने कई बार नीतीश को पलटी करा के मुख्यमंत्री के रुप में ढोया है।
नीतीश भी अब संघी फितरत में रच पच गए थे ये बात उनके समाजवादी साथियों को अखरती रही है किंतु मुख्यमंत्री नीतीश केंद्र से अच्छे संबंधों की बदौलत बिहार का विकास कर पाएंगे ऐसी धारणा इस बार टूट चुकी थी और नीतीश अपने लोगो के बीच घिरने लगे थे।
नीतीश कुमार पर 70 करोड़ के घपले का आरोप भी लगा जिससे ऊपरी तौर पर हल निकाला गया। भाजपा यही चाहती थी। वे जैसे ही कमज़ोर हुए, अमित शाह ने उन्हें राज्यसभा भेजने का मन बनवा लिया। प्रधानमंत्री तो नहीं बन पाए कहा जा रहा है कि उन्हें आगत राष्ट्रपति का भरोसा दिया गया है।
इस भरोसे के साथ यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश बाबू के चिरंजीव निशांत कुमार पर भी भाजपा कृपा बरसा सकती है। उन्हें डिप्टी सीएम बनाकर जदयू को पुचकारा जा सकता है। क्योंकि अभी चुनाव काफी दूर है।
इस बीच सम्राट चौधरी जैसे भाजपा के चहेते को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। क्योंकि उनके आचार विचार और वक्तव्य भाजपा की कसौटी पर खरे नज़र आते हैं। यह तय है कि इस बड़े चुनावी अंतराल में बिहार भगवामय कर वहां हिंदू मुस्लिम भाई चारा को ख़त्म करने की पुरजोर कोशिश जल्द ही देखने मिल सकती है। वे गिरिराज सिंह से कम नज़र नहीं आते। जो इन दिनों केंद्र में कपड़ा मंत्री हैं।
अब बिहार की जनता को तय करना है कि वह भाजपामय बिहार चाहती है या जदयू के कुछ समाजवादी नेता, राजद और कांग्रेस की रीतनीति के मुताबिक देश में राष्ट्रीय एकता को कायम रखने वाले दलों की ओर मुखातिब होती है।
बिहार में भाजपा सरकार बनाने की यह पहल बंगाल चुनाव के लिए भी क्या फायदेमंद होगी। क्योंकि बंगाल में बिहारियों की संख्या बहुत अधिक है। अमित शाह की नज़र बंगाल की तरफ भी है। बिहार तो फिलहाल उड़ीसा की तरह भाजपा का हो ही गया है। बंगाल को हड़पने का यह एक बड़ी घटना है।
महत्वपूर्ण बात ये है,कि नीतीश बाबू की रजामंदी से यह सब हुआ है तो यह उनके लिए ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी जदयू की समाप्ति की ही वजह बनेगा।
संभव है जदयू के सत्ता लोलुप विधायक और निशांत कुमार मंत्रीमंडल में शामिल हों। लेकिन उनकी स्थिति मोदी सरकार के मंत्रियों की तरह सिर्फ दिखावे की होगी। यदि यह सब प्रलोभन के तहत हुआ है जैसा अब तब नीतीश कुमार के साथ हुआ है तो यह सब अब बिहार में नहीं चल पाएगा। एक एक कर सब या तो भाजपा में चले जाएंगे या आरोपों की बलि चढ़ जाएंगे और कुछ राजद या कांग्रेस का दामन थाम लेंगे।
यानि कुल मिलाकर नीतीश का दिल्ली जाना जेडीयू के समाप्त होने का अशुभ संकेत है।
(सुसंस्कृति परिहार टिप्पणीकार व ऐक्टिविस्ट हैं।)